मन के लिए अमृत की बूँदें : विचारों की अद्भुत और निराली पाठशाला

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डॉ. अबरार मुल्तानी की यह किताब सेहत से जुड़ी ख़ास जानकारी सरल भाषा में हमें बताती है.

चिंता चिता के समान होती है। किसी भी काम की अधिक फिक्र हमें बीमार बना देती है, स्वास्थ्य खराब कर देती है। मतलब यह है कि हमारे विचार हमें रोगी और निरोगी बनाते हैं। हमारा स्वास्थ्य इस पर निर्भर करता है कि हम कैसा सोचते-विचारते हैं। जिस तरह सकारात्मकता हमें खुशी से भरा और उत्साहित रखती है, नकारात्मकता उसका उलट करती है। जानेमाने चिकित्सक और बेस्टसेलर लेखक डॉ. अबरार मुल्तानी की किताब 'मन के लिए अमृत की बूँदें' स्वस्थ रहने के बेहतरीन नुस्ख़े बताती है। किताब का प्रकाशन मांड्रेक पब्लिकेशन्स ने किया है।

पहले अध्याय में डॉ. मुल्तानी कहते हैं कि विचारों का जीवन पर सीधा प्रभाव पड़ता है। जैसे विचार मन में आते हैं, वैसे हम बन जाते हैं और हमारा शरीर भी उससे अछूता नहीं रहता। इसका असर स्वास्थ्य पर पड़ता है। अच्छे विचारों से स्वास्थ्य दिन-प्रतिदिन निखरता जाएगा। जबकि बुरे विचार व्यक्ति को रोग से ग्रसित कर देंगे।

किताब इन बिंदुओं पर फोकस करती है :

🔵 विचारों का महत्व 🔵 चिंता से लड़ना

🔵 खुद को व्यस्त रखना 🔵 खुश रहने की आदत डालना

🔵 हर किसी से प्रेम करना 🔵 क्रोध पर नियंत्रण करना

🔵 क्षमा करना, आदि.

किताब में डॉ. अलेक्सिस कैरल का कथन दिया गया है जिसके अनुसार 'जो चिंता से लड़ना नहीं जानते वे जवानी में ही मर जाते हैं।' किताब में प्लूटो का कथन है -'डॉक्टर सबसे बड़ी भूल यह करता है कि वह मन का इलाज किए बिना सिर्फ़ शरीर का इलाज करता है, जबकि मन और शरीर आपस में जुड़े हुए हैं। उनका अलग-अलग इलाज नहीं किया जाना चाहिए।' इन बेशकीमती कथनों के जरिये डॉ. अबरार मुल्तानी ने हमें समझाया है कि इंसान को मुकाबला करना चाहिए, न कि घबराकर बैठ जाना चाहिए। खुद को मानसिक तौर पर तैयार करना बेहद जरूरी है। यह जीवन के हर क्षेत्र में लाभदायक है। वे तांत्रिक का उदाहरण देते हैं और उसी तरह उन्होंने बाज़ की दंतकथा को पाठकों से साझा किया है। आप इन्हें पढ़कर समझ सकते हैं।

किताब में एक अध्याय है -'स्वयं को व्यस्त रखें।' यह सच है कि खुद को काम से जोड़े रखना हमें इधर-उधर की नकारात्मकता और व्यर्थ की समस्याओं से बचाकर रखता है। डॉ. मुल्तानी कहते हैं कि चिंता से मुक्त रहना है तो काम में व्यस्त रहना होगा। जब दिमाग रचनात्मक कार्यों में तल्लीन रहेगा तो अवसाद, तनाव, चिंता आदि का उसके जीवन में कोई स्थान नहीं रहेगा। इससे उसका जीवन खुशियों से भर जाएगा। वह शांति और सुकून का जीवन जिएगा। और अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त करेगा।

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ख़ुशी पर चर्चा करते हुए लेखक कहते हैं कि ख़ुशी हर क्षेत्र में हमारा प्रदर्शन बेहतर करती है। सोच को उन्नत बनाती है। हमें बेहतर महसूस कराती है। हम अधिक अच्छा स्वास्थ्य पाते हैं। ख़ुशी का कोई अवसर नहीं छोड़ना चाहिए। ख़ुश रहने के अवसर खुद भी बनाते रहने चाहिए। मन ख़ुश रहेगा, शरीर ख़ुश रहेगा और हम स्वस्थ रहेंगे।

इस किताब में लेखक ने प्रेम की ताकत के बारे में भी बताया है। उन्होंने डॉ. कार्ल मेनिंगर के हवाले से लिखा है कि 'प्रेम लोगों का इलाज करता है -देने वालों का भी और लेने वालों का भी।' मेनिंगर के इस कथन की पुष्टि डॉ. मुल्तानी ने एक दिलचस्प उदाहरण से की है। उसे आप किताब में पढ़कर समझ सकते हैं। लेखक ने यह भी बताया है कि प्रेम करने वालों की उम्र दूसरों से नौ साल अधिक होती है। मतलब सबसे प्रेम करने वाले, हँसी-ख़ुशी से मिलने वाले लोग ज़्यादा जीते हैं। सीधी से बात है ऐसे लोग स्वस्थ रहते हैं, रचनात्मक होते हैं और सफलता भी पाते हैं।

वास्तव में चिढ़, क्रोध या कुंठा से निरंतर रहने वाला तनाव हृदय संबंधी रोग के जोखिम को बढ़ा देता है। नकारात्मक भाव गंभीरता से हमारे स्वास्थ्य को दुर्बल करते हैं, हमारे प्रतिरोध तंत्र को कमज़ोर करते हैं और हमें बीमारी के प्रति ज़्यादा ग्रहणशील बना देते हैं।

प्रेम के बिना जीवन को लेखक ने एक सज़ा कहा है। साथ ही बताया है कि 'प्रेम में पड़े लोगों के हार्मोन उन्हें विशिष्ट अनुभव करवाते हैं, ये खुशियों के हार्मोन होते हैं जो हृदय, मन और मस्तिष्क को बिलकुल नवीन कर देते हैं।'

लेखक ने अच्छे स्वास्थ्य के लिए धैर्य यानी सब्र को विस्तार से समझाया है। वे कहते हैं कि सब्र का मतलब किसी भी कार्य को शांति और सुकून के साथ करना है। परिणाम आने तक जल्दबाजी नहीं करते हुए निराश न होना ही सब्र है। इसलिए किसी भी कार्य को करते हुए उसे सकारात्मकता से सोचकर शांति से करना चाहिए, परिणाम बेहतर आएंगे।

ऊँची सफलता पाने वाले लोग परिणामों के प्रति समर्पित होते हैं जबकि भागमभाग करने वाले सिर्फ़ गतिविधियों के प्रति समर्पित होते हैं।

डॉ. अबरार मुल्तानी पाठकों से दान करने के लिए कहते हैं। उन्होंने विश्व के महान चिंतकों और विचारकों के कथन भी इस विषय पर दिए हैं। इसमें विंस्टन चर्चिल का एक कथन देखें -'हम आजीविका उससे बनाते हैं जो हमें मिलता है; जीवन उससे बनाते हैं जो हम देते हैं।'

एक अध्याय में लेखक कहते हैं कि ईर्ष्या मन को बेचैन कर देती है, उसे जला देती है। इसलिए दूसरों से ईर्ष्या के बजाय उनके गुणों को अपनाओ। जिस तरह ज्ञानी बनने के लिए ज्ञान अर्जित करना जरूरी है, उसी तरह तंदुरुस्त बनने के लिए व्यायाम जरूरी है।

हमारे स्वास्थ्य के हम स्वयं जिम्मेदार हैं। क्रोध की बात करें तो वह हमारे अंदर उपजता है यानी हम उसे पैदा करते हैं। लेखक कहता है कि क्रोध स्वास्थ्य के लिए घातक है। यह नसों को संकुचित करता है, ब्लड प्रेशर बढ़ाता है, हृदय गति को अनियमित करता है, गुर्दे और लीवर को नुक्सान पहुँचाता है। इसके अलावा भी यह शरीर को क्षति करता है। इसलिए यदि आप बेहतर स्वास्थ्य की इच्छा रखते हैं तो क्रोध से बचें, उसे खुद पर हावी न होने दें।

डॉ. अबरार मुल्तानी की यह किताब हर अध्याय में प्रेरणादायक है। इसमें विश्व के नामी चिंतक, विचारक आदि के कथन हैं। हर अध्याय प्रेरित करने वाला है। इसका उद्देश्य है मनुष्य को रोगी होने से बचाना। इस पुस्तक में समझदारी भरी बातें विचारों की अद्भुत और निराली पाठशाला की तरह हैं जिसमें आपका स्वागत है।

मन के लिए अमृत की बूँदें
लेखक : डॉ. अबरार मुल्तानी
प्रकाशक : मांड्रेक पब्लिकेशन्स
पृष्ठ : 204
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