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विश्व पुस्तक मेला 2020 : दिनकर ग्रंथमाला सीरीज़ में 29 किताबों का लोकार्पण हुआ

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राष्ट्रकवि दिनकर की पुस्तकों को लोकभारती प्रकाशन ने नए रूपाकार में प्रस्तुत किया है.

ठण्ड के बावजूद पुस्तक मेले मेले में लोगों की भीड़ किताबों और पाठकों की दोस्ती को दर्शाती है. पाठक किताबें खरीद रहे हैं. एक तरफ गाँधी सहित्य की किताबों की ब्रिक्री हो रही है तो दूसरी तरफ रामधारी सिंह दिनकर की किताबें भी खूब पसंद की जा रही हैं. रश्मिरथी, संस्कृति के चार अध्याय, हे राम, हारे को हरिनाम किताब पाठकों की पसंद बनकर उभर रहे हैं.

पुस्तक मेला में राजकमल प्रकाशन के स्टॉल पर दिनकर ग्रंथमाला सीरीज़ में 29 किताबों का लोकार्पण किया गया. जन-जन के हृदय सम्राट और राष्ट्रकवि दिनकर की पुस्तकों को लोकभारती प्रकाशन ने नए रूपाकार में प्रस्तुत किया है. दिनकर साहित्य की अन्य पुस्तकें भी नयनाभिराम प्रस्तुति के साथ इसी वर्ष प्रकाशित होंगी। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रोफेसर गोपेश्वर सिंह ने कहा, "दिनकर को पढ़ना भारत की सांस्कृतिक आत्मा को पढ़ना है."

राष्ट्रकवि दिनकर छायावादोत्तर कवियों की पहली पीढ़ी के कवि थे. एक ओर उनकी कविताओं में ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रांति की पुकार है तो दूसरी ओर कोमल श्रृंगारिक भावनायें की अभिव्यक्ति. वे संस्कृत, बांग्ला, अंग्रेजी और उर्दू के भी बड़े जानकार थे.
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‘काँपता हुआ दरिया’ का लोकार्पण

मोहन राकेश के जन्मदिन पर कश्मीर की पृष्ठभूमि पर आधारित उनके उपन्यास ‘काँपता हुआ दरिया’ का हुआ लोकार्पण हुआ. यह उपन्यास मोहन राकेश का अधूरा उपन्यास था जिसे उनकी साहित्य चेतना के मर्मग्य जयदेव तनेजा की पहल पर एक प्रयोग के तौर पर मीरा कान्त ने पूरा किया. मोहन राकेश ने इस उपन्यास को कश्मीर की पृष्ठभूमि पर लिखने की कोशिश थी लेकिन वो इसे पूरा नहीं कर पाए थे. मोहन राकेश की अंतिम इच्छा थी कि इस उपन्यास को कोई कश्मीरी ही पूरा करे.

इस मौके पर साहित्यकार कृष्ण कल्पित ने कहा, “मोहन राकेश की अँधेरे बंद कमरे हिंदी साहित्य में मील का पत्थर है. काँपता हुआ दरिया में भी वही औपनिवेशिक दृष्टि लक्षित होती है.”