Header Ads

banner image

‘नदियाँ हमारे यहाँ सभ्यता संस्कृति दोनों रही हैं, इन्हें नये सिरे से विनम्र आँखों से देखने की ज़रूरत है‘ - अभय मिश्रा

maati-manush-choon-book
'इतिहास नदियों का नहीं, बल्कि मनुष्यों का ही होता है। नदियों का अस्तित्व तो मनुष्यों से भी पहले है।'
विश्व पुस्तक मेले में वाणी प्रकाशन ग्रुप के स्टॉल पर युवा रचनाकार एवं पर्यावरणविद अभय मिश्रा की पुस्तक 'माटी मानुष चून' का लोकार्पण और परिचर्चा की गयी। कार्यक्रम में पर्यावरणविद लेखक एवं पत्रकार सोपान जोशी, स्वतन्त्र पत्रकार अरूण तिवारी और लेखक व पत्रकार पंकज रामेंदु उपस्थित थे।

अभी हाल ही में अमेज़न जंगल में लगी आग की तस्वीरें पूरी दुनिया में चर्चित हुईं, जो कहीं-न-कहीं पर्यावरण और मानवीय अस्तित्व के लिए एक बड़े खतरे की ओर इशारा करती हैं। इस विश्व मे हर व्यवस्था का आधार पर्यावरण है, जो सुनने में सहज लगता है, परन्तु इसकी महत्ता हमारे जीवन में उसी प्रकार है जिस प्रकार, 'दिए में तेल'। इसी पर्यावरण में गंगा, गंगा का पानी केवल मनुष्यों के लिए ही नहीं बल्कि सभी जीव जन्तुओं, खेतों के लिये भी अनिवार्य है, परन्तु क्या हो जब यही पर्यावरण या गंगा प्रदूषित हो जाये, और सकल पारिस्थितिक तंत्र अस्त-व्यस्त हो जाए। इसी समस्या पर अपनी चिन्ता व्यक्त करते हुए, पूरी दुनिया का ध्यान इस ओर लाने के उद्देश्य से 'माटी मानुष चून' की रचना की गयी है।

वाणी प्रकाशन ग्रुप की निदेशक अदिति माहेश्वरी-गोयल, ने मंच का संचालन करते हुए, सभी अतिथियों व श्रोताओं का स्वागत किया। उपन्यास 'माटी मानुष चून' के रचनाकार अभय मिश्रा से ही सबसे प्रथम प्रश्न पूछा गया कि इस उपन्यास के पीछे की क्या कहानी है? अभय मिश्रा ने बताया कि इस उपन्यास की रचना करने से पहले उन्होंने तीन वर्ष गंगा की यात्रा की, बहुत क़रीब से उन्होंने प्रकृति का विश्लेषण किया। यह उपन्यास ख़तरे की आशंका से उपजा है।

आदिति माहेश्वरी-गोयल ने आगे प्रश्न किया कि आज जो गंगा की विकट परिस्थिति है, उसके क्या कारण हैं? इस प्रश्न पर बड़े विस्तार से चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि जहाँ से मनुष्य नदियों को अपना भगवान मानकर पूजने लगता है, समस्या वहीं से उत्पन्न होती है, क्योंकि इस विचारधारा में वह यही मानता है कि उसे नदियों से केवल लेना ही है, नदियों का प्रबंधन, उनकी चिन्ता का क्षेत्र नहीं। उपन्यासकार अभय मिश्रा इसमें जोड़ते हुए कहते हैं कि भारत के लोग धर्म को पकड़ने में अध्यात्म को पीछे छोड़ गये। इस पूरी चर्चा के केन्द्र में 'गाँधी और पर्यावरण' का मुद्दा रहा। 

सोपान जोशी इस सम्बन्ध में बताते हैं कि गाँधी की पुस्तक 'हिन्द स्वराज' में पर्यावरण के ऊपर भी गहन रूप से विचार किया गया है। गाँधी जी किस प्रकार 'मशीनी मानसिकता के विरोधी थे, क्योंकि यही मानसिकता नदियों को बर्बाद करती हैं। जिस धीमी गति से उन्होंने भारत को, यहाँ के लोगों व भूगोल को समझा, यही समझ विकसित करने की आवश्यकता है।

किताब यहाँ से प्राप्त करें : https://amzn.to/2JJ4bxe

maati-manush-choon

किताब के बारे में पढ़ें अभय मिश्रा के विचार : वेंटिलेटर पर ज़िन्दा एक महान नदी की कहानी

पत्रकार सोपान जोशी इस उपन्यास पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं, 'इतिहास नदियों का नहीं, बल्कि मनुष्यों का ही होता है। नदियों का अस्तित्व तो मनुष्यों से भी पहले है। वहीं नदियों पर नये सिरे से सोचने की ज़रूरत है। अदिति माहेश्वरी-गोयल ने उपन्यास की महत्वपूर्ण पंक्ति पर महत्वपूर्ण प्रश्न किया कि 'वेंटिलेटर पर है, नदी इसका क्या अभिप्राय है?

स्वतन्त्र पत्रकार अरुण तिवारी इसके उत्तर में बताते हैं, वेंटिलेटर में जाने की यह हालत, नदियों की नहीं, बल्कि मनुष्यों की है। कई आँकड़ों को श्रोताओं के सामने रखते हुए वह नदियों, पर्यावरण पर चिन्ता व्यक्त करते हैं। वह बताते हैं कि 'यदि नदियों के प्रदूषण की यही स्थिति रही तो वर्ष 2075 तक बांग्लादेश का दो तिहाई भाग, और पूर्वी भारत का भाग स्थायी रूप से जलमग्न हो जायेगा।

एक महत्वपूर्ण, विश्लेषणात्मक चर्चा के बाद, श्रोताओं ने बड़ी उत्सुकता से अपने प्रश्न को अतिथियों के सामने रखा। भारत में हुए कई सामुदायिक क्षेत्रीय आन्दोलनों के उदाहरण देते हुए उन्होंने उत्तर दिया। अन्त में सभी अतिथियों की उपस्थिति में, श्रोताओं की तालियों के बीच पुस्तक का साहित्य मंचन किया गया।