Header Ads

banner image

'रंग कितने संग मेरे' : यह सिर्फ़ आत्मकथा नहीं, दलित आन्दोलन और उत्पीड़न का दस्तावेज़ है

rang-kitne-sang-mere
यह आत्मकथा व्यक्ति और समाज के तौर पर दलित साहित्य का एक प्रामाणिक दस्तावेज बन गई है.
वाणी प्रकाशन के ‘डॉ. प्रेमचंद महेश सभागार’ में विख्यात लेखक एवं पत्रकार मोहनदास नैमिशराय की आत्मकथा 'रंग कितने संग मेरे' का लोकार्पण एवं परिचर्चा लीलाधर मंडलोई, अजय नावरिया, डॉ.सिद्दार्थ, कौशल पंवार, अरुण कुमार, रूपचंद गौतम, शेखर पंवार, सुधीर हिलसायन, रश्मि भारद्वाज, हेमलता यादव आदि लेखकों एवं शोधार्थियों के बीच किया गया। इस अवसर पर वाणी प्रकाशन की सम्पादक रश्मि भारद्वाज ने सभी का स्वागत किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रख्यात कवि और ज्ञानपीठ के पूर्व निदेशक लीलाधर मंडलोई ने की।

वक्ताओं में डॉ. सिद्दार्थ ने कहा कि नैमिशराय अपनी पुस्तक में चित्र रचा है। इसे हम एक पत्रकार की संस्मरणात्मक आत्मकथा भी कह सकते हैं। नैमिशराय के व्याकुल मन ने उन्हें कहीं टिकने नहीं दिया, इसलिए यह एक बेचैन मन की कथा है। जामिया मिल्लिया इस्लामिया के प्रो. और प्रसिद्ध कहानीकार अजय नावरिया ने कहा कि आत्मकथा लेखन बेहद जोखिम भरा है, लेकिन यह आत्मकथा व्यक्ति और समाज के तौर पर दलित साहित्य का एक प्रामाणिक दस्तावेज बन गई है। मुर्दहिया और जूठन की तुलना करते हुए नावरिया ने इसे दोनों का मेल बताया साथ ही उन्होंने कहा कि इसमें स्त्री के प्रति द्वेष उभर कर आया है। नैमिशराय को उन्होंने बोहेमियन लेखक की संज्ञा दी। विख्यात लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता कौशल पंवार ने पुस्तक पर अपनी बात रखते हुए कहा कि यह सिर्फ़ आत्मकथा नहीं, दलित आन्दोलन और उत्पीड़न का दस्तावेज़ है लेकिन इसमें महिला लेखन और आन्दोलन कहीं छूट गया है। माँ का प्रसंग और चूल्हे की रोटी को मार्मिक प्रसंग बताते हुए उन्होंने रिसर्च करने वालों के लिए बेहद महत्वपूर्ण बताया। सहभागिता कर रहे डॉ. रूपचंद गौतम ने कहा कि यह भाषा और सौन्दर्य की दृष्टि से अद्भुत कृति है।

naimishrai-atmkatha-in-hindi
इस पुस्तक को यहां क्लिक कर प्राप्त करें>>

सहभागिता कर रहे लेखक और आलोचक अरुण कुमार ने नैमिशराय के साहित्यिक योगदान पर बात करते हुए कहा कि लेखक अपने समकालीन परिवेश के प्रति बेहद सजग है और यह आत्मकथा में उभरकर आया है। जीवन के विविध रंगों के बीच काला रंग यानि संघर्ष और दुख काफ़ी उभरकर आया है। शेखर पंवार ने कहा कि अगर सभी रंगों को मिला दिया जाए तो काला रंग बनता है जो कि नैमिशराय जी के जीवन में स्थायी हो गया है।

लेखकीय वक्तव्य रखते हुए नैमिशराय ने कहा कि लेखक को सच से नही भागना चाहिए, आत्मकथा झूठ नहीं, ईमानदार अभिव्यक्ति होती है। नैमिशराय जी ने कहा कि मेरी पत्नी की भूमिका मेरे जीवन में बेहद सकारात्मक है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे लीलाधर मंडलोई ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि संघर्ष और स्वाभिमान दो शब्दों के इर्द गिर्द पूरी आत्मकथा के सूत्र पाए जाते हैं,लेकिन आत्मकथा में दिए गए पत्रों की कोई अन्विति कथा के साथ नहीं बनती है। कहीं कहीं पर लेखक लुत्फ़ लेने लगता है अगर रवानी में लिखता तो भावनात्मक कविता की बेहतरीन आत्मकथा होती। उन्होंने कहा कि चौथी आत्मकथा ऐसी हो कि सामने वाला कलम तोड़ दे।

Rang-Kitne-Sang-Mere
इस पुस्तक को यहां क्लिक कर प्राप्त करें>>
कार्यक्रम का संचालन हेमलता यादव ने किया और धन्यवाद ज्ञापन वाणी प्रकाशन के निदेशक अरुण माहेश्वरी ने किया। अरुण माहेश्वरी ने अपना मत रखते हुए कहा कि दलित साहित्य पर आधारित कार्यक्रम में जमीनी स्तर का काम और बातें बेहद संजीदगी से होती हैं। एक प्रकाशक इन किताबों के रूप में अपना समय प्रकाशित करता है। श्रोताओं में दीपा, टेकचंद, सतीश खनगवाल, अरुण, राजपाल, बृजेन्द्र गौतम आदि मौजूद रहे।

(अरुण कुमार)