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'चौंसठ सूत्र सोलह अभिमान' का ऑक्सफ़ोर्ड बुकस्टोर में लोकार्पण

चौंसठ सूत्र सोलह अभिमान
लेखक द्वारा चुनी गईं चौदह हिन्दी की अमर प्रेम कविताओं का भी पाठ किया गया.
प्रेम के महीने फरवरी में राजकमल प्रकाशन की ख़ास प्रस्तुति 'चौंसठ सूत्र सोलह अभिमान' काव्य संग्रह का लोकार्पण ऑक्सफ़ोर्ड बुकस्टोर में किया गया। यह किताब लेखक अविनाश मिश्र की तीसरी कृति है।

चौंसठ सूत्र सोलह अभिमान 'कामसूत्र' से प्रेरित काव्य संग्रह है। बसंत के इस प्यार भरे महीने में अविनाश मिश्र का यह काव्य-संग्रह प्रेम की विभिन्न कलाओं का न केवल वर्णन करता है, बल्कि वात्स्यायन के कामसूत्र की एक आधुनिक व्याख्या भी प्रस्तुत करता है।

इस अवसर पर लेखक द्वारा चुनी गईं चौदह हिन्दी की अमर प्रेम कविताओं का भी पाठ किया गया।

लेखक अविनाश मिश्र ने सवालों का जवाब देते हुए कहा, “मै लंबी कविताओं का विरोधी होता जा रहा हूँ। मेरा मानना है कवितायें जितना हो सकें संक्षेप में होनी चाहिए। यही मेरी काव्य साधना का प्रमुख अंग है। कम शब्दों में अपनी बात कैसे कहूँ इसपर मैं ज्यादा ध्यान देता हूँ।”

ऑक्सफ़ोर्ड बुकस्टोर
असंभव में बसने की चाहत रखने वाले कवि अविनाश मिश्र के काव्य संग्रह ‘चौंसठ सूत्र सोलह अभिमान’ में 80 कविताएँ हैं। लघु प्रेम कथाओं के दौर में 'कामसूत्र' से प्रेरित यह प्रेम की लघु कविताएँ हैं। आकार में लघु, लेकिन अपनी निर्मिति और व्याप्ति में पूर्ण हैं।

कार्यक्रम में कवि अविनाश द्वारा चयनित हिन्दी की चौदह अमर कविताओं - ‘सहर्ष स्वीकारा है’, ‘आरर डाल’, ‘और जीवन बीत गया’, ‘आओ जल भरे जीवन में झांकें’, ‘अगर मैंने किसी के होंठ के पाटल कभी चूमे’, ‘रात आधी खींच कर तुम्हारी हथेली’, ‘प्रेम’,  ‘पहला चुंम्बन’, ‘धूप की भाषा’,  ‘तुम आईं’, ‘सिंदूर तिलकित भाल’ , ‘ट्राम में एक याद’, ‘बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ’ एवं ‘उक्ति’ का काव्य पाठ अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी, अंकिता आंनद, सुमन परमार, प्रभात रंजन, आर अनुराधा, नेहा राय, वर्तिका एवं कुलदीप मिश्र द्वारा किया गया।

अविनाश मिश्र कविता

अविनाश मिश्र कविता के अति विशिष्ट युवा हस्ताक्षर हैं। इस संग्रह में शामिल कविताएँ एक लम्बी कविता के दो खंडों के अलग-अलग चरणों के रूप में प्रस्तुत की गई हैं। कवि प्रेम में आता है और साथ लेकर आता है-कामसूत्र। वात्स्यायन कृत कामसूत्र। इसी संयोग से इन कविताओं का जन्म होता है। कवि प्रेम और कामरत प्रेमी भी रहता है और दृष्टाकवि भी।

वात्स्यायन की शास्त्रीय शैली उसे शायद अपने विराम, और अल्पविराम पाने, वहाँ रुकने और अपने आप को, अपनी प्रिया को, और अपने प्रेम को देखने की मुहलत पाना आसान कर देती है, जहाँ ये कविताएँ आती हैं और होती हैं। यह शैली न होती तो वह प्रेम में डूबने, उसमें रहने, उसे जीने-भोगने की प्रक्रिया को शायद इस संलग्नता और इस तटस्थता से एक साथ नहीं देख पाता।

~समय पत्रिका.