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नासिरा शर्मा के उपन्यास 'अदब में बाई पसली' पर परिचर्चा का आयोजन

नासिरा शर्मा का यह उपन्यास छह खण्डों में प्रकाशित हुआ है.
नासिरा शर्मा के हाल ही प्रकाशित एफ्रो-एशियाई साहित्यों के छह खंडों का उपन्यास 'अदब में बाई पसली' पर परिचर्चा का आयोजन राजकमल प्रकाशन द्वारा साहित्य अकादमी सभागार, मंडी हाउस में किया गया. इस परिचर्चा में मध्य एशियाई देशों के साहित्य और भाषा के जानकार प्रो.अख्तर हुसैन, डॉ. अशोक तिवारी, डॉ. खुर्शीद इमाम, प्रो. ख्वाजा मोहम्मद इकरामुदीन, प्रो. रिजवानूररहमान और डॉ. बलराम शुक्ल ने पुस्तक प्रत्येक खंड पर अपने अपने विचार रखे. परिचर्चा का संचालन ओम निश्चल ने किया.

छह खंडो में संकलित विभिन्न भाषाओँ की इन रचनाओं के माध्यम से लेखिका एक रूप में प्रचलित विमर्शों के बरक्स एक नया विमर्श रचती हैं. उनका हिंदी के अलावा अंग्रेजी, उर्दू पश्तो पर फ़ारसी भाषाओं पर समान अधिकार है. वे अफगानिस्तान, ईरान, इराक आदि देशों की सियासत और अदब की दुनिया पर लगातार नजर रखती रही हैं. उनके एफ्रो-एशियाई देशों के बुद्धजीविओं से गहरे तालुकात रहे हैं. इस तरह न सिर्फ उन्होंने इन देशों के साहिय को बहुत गहराई से पढ़ा और उनके समाजों को नजदीक से देखा-जाना है, बल्कि वो वहाँ की समस्याओं से लगातार टकराती भी रही हैं. लिखने-बोलने की आजादी के लिए कलमकारों को कितनी जद्दोजेहद उठानी पड़ी है, शायरों के कलाम उनके गवाह हैं. तभी तो सीरिया आकर नासिरा शर्मा के होठों से यह बात बेसाख़्ता निकली थी कि 'मैं यहां दुखों की खेती काटने आई हूँ.' गए कुछ दशकों में बुद्धिजीवियों, लेखकों, कलाकारों और आम आदमी पर जो गुजरी है उसका कतरा कतरा इन रचनाओं में मौजूद है.

लेखक ओम निश्चल ने अपनी बात रखते हुए कहा कि लेखिका ने इस पुस्तक के जरिये साहित्य में ऐसे काम को अंजाम दिया है जो बड़ी संस्थाओं के वश का भी नहीं है. मध्य्पूर्व एशियाई व पूर्वी मुल्कों के साहित्य की इस सीरीज को उन्होंने 'अदब की बाईं पसली' कहा है जिसका अर्थ यह कि जीवन और अदब दोनों में स्त्रीं-पुरुष एक दूसरे के पूरक हैं.

लेखिका नासिरा शर्मा ने अपनी रचना और परिकल्पना के बारे में बताते हुए कहा कि इन किताबों की एक-एक लाइन मेरी रूह से निकली है. जिन देशों में मैं गई, वहाँ के कला, साहित्य व संस्कृति को 35 वर्षों में लिखा चाहे वो अनुवाद हो, लेख, कहानी, निबंध, उपन्यास हो सब कुछ पाठकों तक इन छह खंडो में पहुँचाने का प्रयास किया है. उन्होंने कहा कि इन खंडो के सभी रचनाकार अपनी भाषा के महत्वपूर्ण रचनाकार हैं और अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हैं.

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जेएनयू प्रो.अख्तर हुसैन ने एफ्रो-एशियाई लघु उपन्यास पर अपने मत रखते हुए कहा कि लघु उपन्यासों को लेखिका ने जिस तरह से अनुवादित किया है वो अद्भुत है. परशियन से हिंदी में अनुवाद करना इतना आसान नही है.

डॉ.अशोक तिवारी ने एफ्रो-एशियाई नाटक एवं बुद्धजीविओं से बातचीत खंड पर अपने विचार रखते हुए कहा कि पुस्तक 'अदब में बाई पसली' अपने नाम में ही एक रुपक लिए हुए है. लेखिका ने इसे बड़े धैर्य, गहन शोध और व्यापक तरीके से लिखा है और खुबसूरत शब्दों के चयन से नाटकों के पात्रों को जीवंत किया है. गौहर मुराद का नाटक 'पशुबाडा' को पढ़ते हुए आज के भारत की याद आती है.

डॉ. खुर्शीद इमाम ने एफ्रो-एशियाई कहानियों पर बोलते हुए कहा कि इजराइल हिब्रू की कहानियों को हिंदी में लाने का बीड़ा उठाने और भारतीयों के बीच में लाना लेखिका का काबिलेतारीफ काम है. हिब्रू कहानियों को थोड़ी बहुत ही जगह मिली है मगर में चाहता हूँ कि इस कारवां को कोई आगे लेके चले और हिब्रू की और कहानियां भारतीयों के सामने आयें.

प्रो.ख्वाजा मोहम्मद इकरामुदीन ने भारतीयेतर उर्दू कहानियों  पर अपने मत रखते हुए कहा कि ख्वाब और सच में जो फर्क होता है वह इन खण्डों में नजर आता है. किताब को बड़ी खूबसूरती और कम लब्जों में बेहतर से बेहतर शब्दों से सजाया है.  यह काम एक बेहतरीन लेखक ही कर सकता है.

प्रो बलराम शुक्ल ने पुस्तक पर अपने विचार रखते हुए कहा कि मध्य पूर्व की भाषाओं के कवि प्रमाणिक रूप से हमारे सामने आये यह जरूरी है. गद्यकाव्य की लेखिका होने के बावजूद कविताओं को बड़ी संगीतमय तरीके से लिखा है और इतनी बड़ी कमी की पूर्ति इन  छह खण्डों के आने से हो पायी है. यह अपने आप में एक उपलब्धि है.

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प्रो. रिजवाननूररहमान ने अपना मत रखते हुए कहा कि मध्य एशियाई मुल्को के साहित्य पर भारत में इतने व्यापक तरीके से पहली बार लिखा गया है. इन खंडो में एक बहुत बड़ा हिस्सा अरबी का है जिनमें कवियों का चुनाव बड़े ध्यानपूर्वक ढंग से किया गया है. भारत में हिंदी, उर्दू दोनों भाषा के लोगों के लिए ये पुस्तकें पढने लायक हैं.

राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने कहा कि यह पुस्तक प्रकाशित करना राजकमल प्रकाशन के लिए एक बड़ी चुनौती थी. इस कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि एशियाई महाद्वीप के देशों के साहित्य का अनुवाद हिंदी में न के बराबर हुआ है और यह प्रयोग हिंदी साहित्य में पहली बार हुआ है.

एफ्रो-एशियाई कविताओं के पहले खंड में नेपाल, अफगानिस्तान, इथियोपिया, सोमालिया, कुवैत व अन्य देश, फिलिस्तीन, ईरान, सीरिया, इराक़ व हिंदुस्तान, पाकिस्तान, तजाकिस्तान, लेबनान आदि देशों के कवियों की कविताएँ शामिल हैं. इन देशों के राजनीतिक हालात को देखें तो अफगानिस्तान, इराक़,  ईरान और सीरिया, फिलिस्तीन, जिस भयावहता से गुजरे हैं उसके निशान भौतिक तौर पर चाहे मिट जाएँ, पर आत्माई और हृदय पर लगी खरोंचें जब कविता या किस्सागोई की काया में घुल मिल जाती हैं तो अमिट हो जाती हैं.