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अल्पना मिश्र के उपन्यास 'अस्थि फूल' पर परिचर्चा

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यह उपन्यास झारखंड आंदोलन की बुनियाद और आदिवासी समाज की दास्तान पर आधारित है.
चर्चित लेखिका अल्पना मिश्र के उपन्यास 'अस्थि फूल' पर परिचर्चा का आयोजन हिंदी भवन में किया गया। इस परिचर्चा में वक्ताओं में निर्मला जैन, ममता कालिया, अनामिका, अभय कुमार दुबे, अवधेश प्रीत, संजीव कुमार एवं प्रेम भरद्वाज मौजूद थे एवं संचालन आकांक्षा पारे द्वारा किया गया।

राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित 'अस्थि फूल' उपन्यास आंदोलन और विस्थापन के बहुपरतीय सवालों से जूझता, झारखंड आंदोलन और वहाँ की औरतों के बाजार में बेचे जाने की दारुण कथा है। अल्पना मिश्र का यह दूसरा उपन्यास एक ऐसा समाजिक-राजनीतिक उपन्यास है जो पहली बार किसी स्त्री कथाकार की कलम के द्वारा काफी सशक्त ढंग से लिखा गया है।

उपन्यास के लिखने की प्रक्रिया पर अपने अनुभव साझा करते हुए अल्पना मिश्र ने कहा- 'इस उपन्यास को लिखने के बाद मैंने महसूस किया कि लेखक के बोलने का सबसे अच्छा तरीका उसका लेखन होता है। झारखंड की जिन लड़कियों की कहानी पर यह उपन्यास आधारित है, उनकी दिक्कतों को देखकर मैंने निश्चय किया कि मैं उनकी कहानी जरूर कहूँगी। इसके लिये चाहे जितनी भी यातनाएं और कठिनाईयां सहनी पड़ें।'

आलोचक संजीव कुमार ने कहा कि इस उपन्यास को लिखने के लिये लेखिका के साहस को सलाम करना चाहिए। उन्होंने कहा कि इसे पढ़ते हुए यह पता लगता है कि यह ना जाने कौन सी संस्कृति है इस देश की जो औरतों को इतना रोंधती है।

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लेखक एवं संपादक अभय कुमार दुबे ने उपन्यास की उपयोगिता पर बात करते हुए कहा कि इसमें चार तरह के समय और तीन तरह के यथार्थ को दर्शाए गया है। इन्हें स्पष्ट करना और कलात्मक तरीके से लिखना इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता है।

झारखंड आंदोलन की बुनियाद और आदिवासी समाज के सपने के टूटने की दास्तान पर आधारित यह उपन्यास साहित्य में अपनी एक विशेष पहचान बनाता है। इस विषय पर संपादक प्रेम भारद्वाज, लेखक एवं पत्रकार अवधेश प्रीत और प्रसिद्ध साहित्यकार ममता कालिया ने भी अपने विचार साझा किए।

कार्यक्रम के अंत में अपने अध्यक्षीय वक्तव्य को रखते हुए वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. निर्मला जैन ने कहा कि इस उपन्यास को लिखना अपने आप में एक चुनौती है। इस पढ़ते हुए पता लगता है कि लेखिका ने इस उपन्यास पर कितनी मेहनत की है।