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सुधीश पचौरी की पुस्तक 'तीसरी परम्परा की खोज' का लोकार्पण व चर्चा

सुधीश पचौरी की पुस्तक
लीलाधर मंडलोई और वाणी प्रकाशन के प्रबन्ध निदेशक अरुण माहेश्वरी भी उपस्थित रहे.
विश्व पुस्तक मेले में वाणी प्रकाशन के स्टॉल पर मार्क्सवादी समीक्षक, प्रख्यात स्तम्भकार और मीडिया विशेषज्ञ सुधीश पचौरी की नयी आलोचनात्मक कृति 'तीसरी परम्परा की खोज' का लोकार्पण व चर्चा का आयोजन हुआ।

सुधीश पचौरी ने अपने वक्तव्य में कहा कि साहित्य भी इतिहास है। जब हम इसे तीसरी परम्परा कहते हैं तो इसमें पहली व दूसरी परम्परा भी समाहित हो गयी है। इतिहास के साथ आलोचना का डिपार्रचर पॉइंट क्या होगा? इतिहास का साहित्यिक मोह। पचौरी ने आगे कहा कि अब तक साहित्य इतिहास का प्रतिफल नज़र आता है। इतिहास की सबसे बड़ी समस्या ये थी कि इस्लाम को साहित्य में किस रूप में लिया। कोई भी इतिहास सीधी लाइन नहीं होता, उदाहरण शुक्ल जी ने माना यह इस्लाम का धक्का था, वहीं द्विवेदी जी कहते हैं इस्लाम आता न आता ऐसा ही रहता, हिन्दी साहित्य का इतिहास वहीं रहता। इतिहास व साहित्य के मिलने में कोई परम्परा तो रही होगी। यही तीसरी परम्परा है।

सुधीश पचौरी ने कहा कि हमारे इतिहास में काफ़ी चीज़ें छुपा ली गयीं। वह इस मिथ को तोड़ते नहीं हैं कि संसार में सभी कष्टों में ईश्वर का नाम ले लो, नाम ही काफ़ी है। सत्संग से ही भगवान की कृपा प्राप्त होती है। नवीन पाठक वर्ग नये साहित्य के तथ्यों से अवगत हो यही हमारी जिज्ञासा है।

संवाद के इस कार्यक्रम में लीलाधर मंडलोई और वाणी प्रकाशन के प्रबन्ध निदेशक अरुण माहेश्वरी भी उपस्थित रहे।

~समय पत्रिका.