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‘हिन्दी का ताना-बाना और वैश्विक परिप्रेक्ष्य’ पर परिचर्चा

‘हिन्दी का ताना-बाना और वैश्विक परिप्रेक्ष्य’
'हिन्दी समावेशी भाषा है। भाषा के साथ एक परम्परा व संस्कृति चलती है'
वाणी प्रकाशन के स्टॉल पर विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर ‘हिन्दी का ताना-बाना और वैश्विक परिप्रेक्ष्य’ पर परिचर्चा आयोजित की गयी। कवि, अनुवादक व गद्यकार सुरेश सलिल, कहानीकार, उपन्यासकार व नाटककार महेश कटारे, उपन्यासकार रत्नेश्वर पांडेय एवं कथाकार व उपन्यासकार एस. आर. हरनोट ने परिचर्चा में भाग लिया।

प्रतिभागियों ने मुख्य रूप से भाषा की मृत्यु की आशंका, भाषा प्रदूषण, अंग्रेज़ी के वर्चस्व और भाषा के साथ मनुष्यता के संकट पर भी बात की। महेश कटारे ने कहा कि हिन्दी समावेशी भाषा है। भाषा के साथ एक परम्परा व संस्कृति चलती है।

अनुराग सौरभ ने अपने विचार रखते हुए कहा कि हमारी भाषा में शब्दों की कोई कमी नहीं है जो अन्य भाषा के शब्दों को शामिल करें। सुरेश सलिल का कहना था कि यह दौर मनुष्यता के लिए सबसे मुश्किल दौर है। भाषा बहता नीर है। जैसे नदी में प्रदूषण होती है, उसी प्रकार भाषा प्रदूषित होती है।

एस.आर. हरनोट जी ने हिमाचल और वहाँ की बोलियों के लिए भाषाई चिन्ता जाहिर की। उन्होंने कहा कि हिन्दी सभी भाषाओं का हृदय से स्वागत करती है।

~समय पत्रिका.