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रेत-समाधि हर साधारण औरत में छिपी एक असाधारण स्त्री की महागाथा है

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गीतांजलि श्री की कहानियों में साथ-साथ एक पूरा जीवित संसार चलता है.
इस वर्ष के चर्चित उपन्यासों में से एक 'रेत समाधि' पर राजकमल प्रकाशन द्वारा परिचर्चा का आयोजन किया गया। गीतांजलि श्री के इस नए उपन्यास पर यह परिचर्चा इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित की गई। गीतांजलि श्री का उपन्यास 'रेत-समाधि' हर साधारण औरत में छिपी एक असाधारण स्त्री की महागाथा तो है ही, साथ ही साथ यह संयुक्त परिवार की तत्कालीनस्थिति, देश के हालत और सामान्य मानवीय नियति का विलक्षण चित्रण भी है।

इस परिचर्चा में पत्रकार व लेखिका मृणाल पाण्डे, प्रसिद्ध कवि प्रयाग शुक्ल, प्रोफेसर हरीश त्रिवेदी, लेखक और आलोचक रविन्द्र त्रिपाठी व लेखिका गीतांजलि श्री वक्ता के रूप में उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन आशुतोष कुमार ने किया। इस बातचीत में उपन्यास, हिन्दी साहित्य व लेखन से जुड़ी कई बातें उभरकर आईं।

आशुतोष कुमार ने परिचर्चा शुरू करते हुए कहा कि गीतांजलि श्री के कहानी लेखन का एक अलग ही अंदाज़ है। उनकी कहानियों में साथ-साथ एक पूरा जीवित संसार चलता है।

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लेखक व आलोचक रविन्द्र त्रिपाठी ने रेत समाधि पर अपना वक्तव्य देते हुए कहा कि यह वक्त हिन्दी साहित्य में एक बड़ी सृजनात्मकता का समय है। यह उपन्यास भी एक नया विमर्श पैदा करता है। हिन्दी में इस तरह के उपन्यास बहुत ही कम लिखे गए हैं।

मृणाल पाण्डे ने परिचर्चा में अपनी बात रखते हुए कहा कि यह उपन्यास सारी सरहदों को निरर्थक बना देने वाला और निरर्थक चीज़ों को एक-साथ जोड़ कर सार्थक बना देने वाला है। उन्होंने कहा कि इस उपन्यास में माँ की उपस्थिति काफी मार्मिक है। माँ का जाना एक तरह से मुक्तिदायक भी होता है और दर्ददायक भी।

हरीश त्रिवेदी ने कहा कि गीतांजलि श्री की भाषा में जो दक्षता और अविष्कारिता है उसका आनंद आप हर पन्ने पर ले सकते हैं। भाषा का प्रयोग अद्भुत है, कई नये-नये मुहावरों को इस उपन्यास में गढ़ा गया है। हिंदी में जितने रंग और रूप होते हैं वे इस पुस्तक में दिखते हैं।

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कथा लेखन की एक नयी छटा है इस उपन्यास में। इसकी कथा, इसका कालक्रम, इसकी संवेदना, इसका कहन, सब अपने निराले अन्दाज़ में चलते हैं। हमारी चिर-परिचित हदों-सरहदों को नकारते लाँघते। जाना-पहचाना भी बिलकुल अनोखा और नया है यहाँ। इसका संसार परिचित भी है और जादुई भी, दोनों के अन्तर को मिटाता। काल भी यहाँ अपनी निरंतरता में आता है। हर होना विगत के होनों को समेटे रहता है, और हर क्षण सुषुप्त सदियाँ। मसलन, वाघा बार्डर पर हर शाम होनेवाले आक्रामक हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानी राष्ट्रवादी प्रदर्शन में ध्वनित होते हैं ‘कत्लेआम के माज़ी से लौटे स्वर’, और संयुक्त परिवार के रोज़मर्रा में सिमटे रहते हैं काल के लम्बे साए। और सरहदें भी हैं जिन्हें लाँघकर यह कृति अनूठी बन जाती है।

प्रयाग शुक्ल का कहना था कि उपन्यास का अंश पढ़ा व उसके बाद उपन्यास पर बोलते हुए कहा कि यह उपन्यास भरोसा दिलाता है कि साँसों पर कब्ज़ा करने वालों और उनको कुचलने वालों के खिलाफ भी लिखा जा रहा है। उन्होंने कहा कि मैंने इस उपन्यास पर लिखा है तथा कई बार और लिखना चाहता हूँ।

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लेखिका गीतांजलि श्री ने इस उपन्यास को लिखते समय के अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि मैंने बहुत लम्बे अरसे को इस कृति के साथ जीया है।कभी-कभी मुझे लगा कि इस उपन्यास को लिखते-लिखते मैं भी रेगिस्तान में रेत की समाधि बन गयी हूँ। कितने किरदार, कहानियाँ और हवाएँ चली आई और यह उपन्यास बन पड़ा। उन्होंने कहा कि मेरी परम्परा, समाज, मेरे पूर्व लेखकों और मेरे समकालीन लेखकों से हौसला मिला और यह कृति बनती गयी। उन्होंने उपन्यास के एक अंश का पाठ भी किया।