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सुधाकर अदीब के उपन्यास 'कथा विराट' का लोकार्पण

katha virat book launch
कथा विराट में भारतीयों द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े गये आधुनिक महाभारत की वृहद कथा है.
भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की 143वीं जयंती के अवसर पर राजकमल प्रकाशन द्वारा सुधाकर अदीब के उपन्यास 'कथा विराट' का लोकार्पण मंडी हाउस के साहित्य अकादमी सभागार में किया गया है. इस कार्यक्रम की अध्यक्षता  हिन्दी की विख्यात लेखिका चन्द्रकान्ता, मुख्य अतिथि आलोचक और व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय मुख्य वक्ता में समकालीन चर्चित विचारक सुशील पंडित और संचालन डॉ. नीरज चौबे ने किया. यह पुस्तक लोकभारती प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गयी है.

भारत का स्वाधीनता आन्दोलन जिस प्रकार से लड़ा गया उसमें आये अनेक उतार-चढाव और संघर्ष हमें प्राचीन महाभारत की याद दिलाते हैं. कथा विराट के 18 अध्यायों में भारतीयों द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े गये आधुनिक महाभारत की वृहद कथा बेहद दिलचस्प और तथ्यपरक ढंग से श्नंखलाबद्ध है.

ऐतिहासिक उपन्यास 'कथा विराट' के लोकार्पण के अवसर पर बोलते हुए उपन्यासकार सुधाकर अदीब ने कहा कि यह उपन्यास इतिहास में करवटें लेती एक वृहद कथा है, जिसमें 35 वर्षों का हमारे महान पूर्वजों का एक जीता जागता इतिहास समाहित है. महात्मा गाँधी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटते हैं और वे भारतीय स्वाधीनता आंदोलन की एक नई इबारत लिखते हैं. महात्मा गांधी तो उस युग की आत्मा थे. उनके निकटतम अनुयायी सरदार पटेल आगे चलकर राष्ट्र-निर्माता लौहपुरुष हुए. उपन्यास में वे प्रमुख भूमिका में हैं. 'कथा विराट' सरदार वल्लभभाई पटेल के कर्मठ जीवन की दास्तान है जो 1950 में उनके महाप्रयाण के साथ समाप्त होती है.

समकालीन चर्चित विचारक एवं समारोह के मुख्य वक्ता सुशील पंडित ने कथाकृति की विशेषता बताते हुए भावपूर्ण शब्दों में कहा कि 'कथा विराट' समय का निर्बाध प्रवाह है. विराट उद्वेलन का निर्पेक्ष साक्षी है। विराट स्थूल का विस्तार ही नहीं है, सूक्ष्म में अंतर्निहित तत्त्व का साक्षात्कार भी है.

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सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार और 'व्यंग्य यात्रा' पत्रिका के संपादक मुख्य अतिथि प्रेम जनमेजय ने कहा कि इस उपन्यास का आरम्भ ही पाठक को अपने कथात्मक मोहपाश में ऐसा बांधता है कि वह ग़ालिब के सुर में कहता है नींद रात भर क्यों नहीं आती। कथा और तथ्य चित्रण में संतुलन ही इसे विराट कथा बनाता है. इस प्रकार के लेखन में अनेक ख़तरे हैं और वे ख़तरे सुधाकर अदीब ने उठाये हैं.

सुप्रसिद्ध कथाकार चन्द्रकान्ता ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। उन्होंने सुधाकर अदीब की कथाकृति को एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेज़ बताते हुए कहा कि उपन्यासकार की अन्वेषक दृष्टि यथार्थ के पीछे के सच को अनावृत कर, राजनीति की उठापटक, सत्तामोह और षड्यंत्रों का भी बेबाकी से पर्दाफ़ाश करती है. इस दौरान राष्ट्रीय सियासतदानों के कार्यकलापों के बीच जल में कमलवत खड़े सरदार पटेल का चरित्र परत दर परत खुलता जाता है. कार्यक्रम का संचालन डॉ नीरज चौबे ने किया.

राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने इस अवसर पर बोलते हुए कहा कि यह उपन्यास सरदार पटेल के जीवन और योगदान पर लिखा गया है. सरदार पटेल स्वतंत्रता से पहले और बाद में भी हमारे वरिष्ठ राजनेताओं में रहे. रियासतों मे बिखरे हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरोकर राष्ट्र के रूप में स्थिर करने में सरदार पटेल का एक बड़ा योगदान था. उनकी जयंती पर उनकी स्मृति को नमन करते हैं. वहीं गुजरात में उनकी विराट प्रतिमा का अनावरण हुआ है.

संचालक डॉ. नीरज चौबे ने कहा कि यह महान कृति एक विलक्षण पुरुष सरदार पटेल पर है जिनपर आज भी हम गौरव करते हैं.

अंत में राजकमल प्रकाशन समूह की ओर से अशोक माहेश्वरी ने सभी सभी विद्वानों और साहित्यप्रेमी अभ्यागतों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन किया. इस अवसर पर अनेक विशिष्टजन उपस्थित रहे.