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राग दरबारी के 50 वर्ष पर कृति उत्सव का आयोजन

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राग दरबारी के नए आवरण वाले सजिल्द और पेपरबैक संस्करण का लोकार्पण किया.
"शहर का किनारा। उसे छोड़ते ही भारतीय देहात का महासागर शुरू हो जाता था। वहीं एक ट्रक खड़ा था।" ये श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास राग दरबारी की शुरूआती पंक्तियाँ हैं। इस उपन्यास के प्रकाशन के पचास साल पूरे होने पर राजकमल प्रकाशन ने कृति उत्सव का आयोजन सत्य साईं सभागार में किया। इस आयोजन की शुरूआत एक विशेष व्याख्यान से हुई जिसे जिलियन राइट, पुरुषोत्तम अग्रवाल, पुष्पेश पंत, ज्यां द्रेज़ और देवी प्रसाद त्रिपाठी ने सम्बोधित किया। व्याख्यान के बाद महमूद फारूक़ी और दारैन शाहिदी ने दास्तान-ए-राग दरबारी पेश किया।

इस कार्यक्रम में पूर्व केन्द्रीय मंत्री कपिल सिब्बल, दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, ओम थानवी, नंदिनी सुंदर, अजीत अंजुम,सुमित अवस्थी, अनुषा रिज़वीनगमा सहर, प्रभात शुंगलू, अशोक वाजपेयी, रंजीत कपूर, प्रभात रंजन, हेमन्त शर्मा सहित साहित्य, पत्रकारिता से जुड़े लोग व कई आम श्रोता उपस्थित थे।

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कार्यक्रम को शुरू करते हुए राजकमल प्रकाशन समूह के प्रबन्ध निदेशक अशोक महेश्वरी ने कहा कि हिंदी साहित्य में इस उपन्यास का विशेष स्थान है और रहेगा। उन्होंने कहा कि लेखकों पर कार्यक्रम होते रहे हैं। हम राग दरबारी पर कृति-उत्सव का आयोजन करते हुए कृतियों पर कार्यक्रम की नई परम्परा शुरू कर रहे हैं।

पुष्पेश पन्त ने राग दरबारी की आज के समय में प्रासंगिकता पर बात रखते हुए कहा कि आज का हिंदुस्तान शिवपालगंज नहीं हो सकता है, यह बाबरी मस्ज़िद के विध्वंस होने के पहले का भारत है, यह आपातकाल के पहले का भारत है और हरित-क्रांति के पहले का भारत है।

साहित्यकार और आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा,'मैंने जब पहली बार राग दरबारी उपन्यास पढ़ा तब मेरी उम्र चौदह बरस थी। इस उपन्यास को पचास बार पढ़ चुका हूँ और पचास बार और पढ़ूंगा।' उन्होंने कहा कि आज का शिवपालगंज पहले से ज्यादा हिंसक संवेदनहीन और विवेकहीन हो गया है।

विख्यात अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ ने कहा कि पुराने दिनों में दलित-शोषित-महिलाओं पर नियंत्रण पिटाई द्वारा होता था। अब पिटाई नहीं कर सकते तो सारी योजनाओं पर कब्ज़ा करके उनपर नियंत्रण कर रहे हैं। रागदरबारी इसी नियंत्रण की कहानी है।

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राग दरबारी की अंग्रेजी अनुवादक जिलियन राइट ने कहा कि रागदरबारी जैसी किताब तो अंग्रेजी में न कोई थी न है। लेखक श्रीलाल शुक्ल अनुवादक के लिए एक आदर्श लेखक थे। उन्होंने कहा कि राग दरबारी में इतनी कहानियाँ हैं कि पूरे एक महीने तक दास्तान चल सकती है।"

देवी प्रसाद त्रिपाठी ने राग दरबारी के 50वें प्रकाशन वर्ष में छपे नए आवरण वाले सजिल्द और पेपरबैक संस्करण का लोकार्पण किया, उसके बाद उपन्यास पर बोलते हुए कहा कि रागदरबारी उपन्यास में पहले पन्ने से ही मुहावरों का प्रयोग किया गया है। श्रीलाल शुक्ल अपने मुहावरे अवधी और अंग्रेजी से लेते थे और उनके मुहावरे काफी धारदार होते थे।

दास्तान शुरू होने से पहले राग दरबारी के विशेष संग्रहणीय संस्करण के शीघ्र प्रकाशित किए जाने की घोषणा राजकमल प्रकाशन समूह के संपादकीय निदेशक सत्यानन्द निरुपम ने की। सीमित संख्या में छपने जा रहे इस डिलक्स एडिशन की झलक चित्रकार विक्रम नायक की उपस्थिति में दिखलाई गई।

व्याख्यान के बाद दास्तान-ए-राग दरबारी पेश किया गया। दो घण्टे तक चली इस दास्तानगोई को लोग अंत तक न केवल धैर्य से सुनते रहे, बल्कि हर एक प्रसंग पर तालियों या हँसी की खिलखिलाहट से हॉल गुंजाते रहे। दास्तानगो महमूद फ़ारूक़ी और दारैन शाहिदी इस 'दास्तान-ए-राग दरबारी' की तैयारी महीनों से कर रहे थे। उन्होंने बहुत कुशलता से नागार्जुन, मुक्तिबोध, कैलाश गौतम, इनायत मेहरबानी की कविताओं को जरूरत के हिसाब से दास्तान में गूँथा था।

कार्यक्रम के अंत में राजकमल प्रकाशन समूह के अलिंद महेश्वरी ने कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए सभी को धन्यवाद दिया।

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यह आयोजन अपने होने के पहले से लेकर बाद तक सोशल मीडिया पर लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। हर उम्र के लोग इस कालजयी उपन्यास पर नए सिरे से विचार-विमर्श में लग गए हैं। आयोजन को अनूठा बताते हुए कई लोगों ने राजकमल प्रकाशन समूह व दास्तानगोई टीम को बधाई दी।

श्रीलाल शुक्ल ने 1964 में राग दरबारी उपन्यास को लिखना शुरू किया था। और 1967 में यह उपन्यास को पूरा हुआ। इसका प्रकाशन 1968 में हुआ था और 1970 में इस उपन्यास को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। 1986 में दूरदर्शन पर इस उपन्यास पर आधारित एक धारावाहिक का भी प्रसारण हुआ था। अब तक इस उपन्यास की पाँच लाख से अधिक प्रतियाँ बिक चुकी हैं।

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