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'हिंदी महोत्सव ने विश्व भर के हिन्दी कर्मियों को ऑक्सफोर्ड में जोड़ा' -अरुण माहेश्वरी

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हिंदी महोत्सव के पहले दिन तीन पुस्तकों का लोकार्पण किया गया.
हिंदी महोत्सव 2018 का उद्घाटन ऑक्सफ़ोर्ड में किया गया। उद्घाटन सत्र में दीप प्रज्वलन अनिल शर्मा ‘जोशी’ (निदेशक, भारतीय संस्कृति केन्द्र, चांसरी प्रमुख, फ़िजी), डॉ. पद्मेश गुप्त (संस्थापक यू.के. हिन्दी), दिव्या माथुर (संस्थापक ‘वातायन’), अरुण माहेश्वरी (चेयरमैन वाणी फ़ाउण्डेशन) और नीलिमा आधार डालमिया (अध्यक्ष, प्रवासी लेखन सत्र) ने किया।

वाणी फ़ाउण्डेशन के चेयरमैन अरुण माहेश्वरी ने अपने सम्बोधन में कहा कि यह ‘हिन्दी महोत्सव’ की बड़ी पहल है कि विश्व भर में फैले हिन्दी कर्मियों को एक साथ ऑक्सफोर्ड में जोड़ा। साथ ही उन्होंने प्रवासी लेखन पर वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित तीन पुस्तकें डॉ. पद्मेश गुप्त की ‘प्रवासी पुत्र’, दिव्या माथुर द्वारा सम्पादित स्त्री प्रवासी लेखिकाओं की कहानियों का संग्रह ‘इक सफ़र साथ-साथ’ और अनिल शर्मा ‘जोशी’ की पुस्तक ‘प्रवासी लेखन : नयी ज़मीन नया आसमान’ की ओर ध्यान आकर्षित किया कि यह प्रवासी लेखन विधा के लिए नया अध्याय है। साथ ही यह भी कहा कि हिन्दी महोत्सव पहल हिन्दी भाषा के सौन्दर्य तकनीकीकरण और सबसे जरूरी युवा पीढ़ी के लिए भाषा को तैयार करके उसके साथ कदमताल करना इस ध्येय का असल वैश्विक रूप हिन्दी महोत्सव के चौथे अध्याय में हम सबके सामने आया है।

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कार्यक्रम में अनिल शर्मा ‘जोशी’ की पुस्तक ‘प्रवासी लेखन : नयी ज़मीन नया आसमान’ का लोकार्पण हुआ । इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार कुसुम अंसल ने कहा कि यह बहुत गौरव की बात है कि हिन्दी के बड़े प्रवासी लेखक अनिल जी की किताब हिन्दी महोत्सव के मंच से पूरी दुनिया के प्रवासी लेखकों के बीच पहुँच रही है। ‘वातायन’ की  कोषाध्यक्ष शिखा वार्ष्णेय ने कहा कि अनिल जोशी की पुस्तक उन सभी प्रवासी लेखकों के लिए अत्यन्त आवश्यक है जो अपने देश से इतनी दूर रहकर अपनी भाषा को जीवित रखने की कोशिश करते आये हैं। कार्यक्रम की अध्यक्ष नीलिमा आधार डालमिया ने कहा कि हिंदी महोत्सव प्रवासी लेखन का स्नातक समारोह है।

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ऑक्सफोर्ड बिज़नेस कॉलेज के निदेशक डॉ. पद्मेश गुप्त ने अपने स्वागत सत्र में कहा कि हिन्दी भाषा को समर्पित कई कार्यक्रम यू.के. में होते आये हैं लेकिन यह पहली बार है कि हिन्दी महोत्सव के बैनर तले इन सभी कार्यक्रमों को एक बृहद आकार मिला है। डॉ. गुप्त ने सभी का स्वागत करते हुए इस बात को रेखांकित किया कि यूनाइटेड किंगडम में बच्चों को हिन्दी पढ़ाने का बीड़ा उन्होंने दशकों पहले उठाया था। आज वो बड़ा आन्दोलन बन चुका है और हिन्दी महोत्सव के चौथे दिन स्लोह में और बर्मिघम में उन्हीं बच्चों द्वारा प्रस्तुतियाँ की जायेंगी। भारतीय और गैर-भारतीय नागरिकता के होते हुए भी इन बच्चों का हिन्दी भाषा के प्रति समर्पण देखने बनता है ।

कार्यक्रम में ‘हिन्दी सिनेमा और साहित्य’ पर परिचर्चा रखी गयी जिसका संचालन ललित जोशी ने किया। ललित जी ने अपने सवालों में साहित्य और सिनेमा के बीच सम्बन्ध पर रोशनी डालने का प्रयास किया, जिसके उत्तर में स्वर्ण कमल से सुसज्जित लेखक यतीन्द्र मिश्र ने कहा कि साहित्य और सिनेमा भारतीय कांशसनेस की जुबान है और भारतीय संवेदना को एक सेतु में बाँधते हैं।

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पेशे से फ़िल्मकार तथा मशहूर गीतकार गुलज़ार के साथ काम कर चुके अजय जैन ने कहा कि साहित्य और सिनेमा के बीच का जो आलोचनात्मक रिश्ता है उससे ऊपर उठकर एक निर्देशक की भूमिका में जब कोई कलाकार आता है तो वह एक पतली पगडंडी पर चलता है जहाँ पर साहित्य और उसके सिनेमाई रूपान्तर के बीच सन्तुलन बनाने का काम उसके पास होता है। इसी को बखूबी उन्होंने गुलज़ार साहब से सीखा जब उन्होंने मुंशी प्रेमचन्द की तहरीरे कार्यक्रम में काम किया तो उन्हें यह समझ आया कि समय के साथ लेखक की परिकल्पना जो मूल कृति में की गयी, वह बदल जाती है, उसका सिनेमाई रूपान्तरण बदल जाता है, इसलिए यह निर्देशक का काम है कि किसी साहित्यकार ने जिस प्रकार का परिवेश अपनी कृति में उजागर किया उसको सिनेमाई रूप से बड़े पर्दे पर जब कोई फ़िल्म निर्देशक लेकर जाता है तो किस तरीके से वो पूरे परिवेश को अपने साथ सँजोकर वैश्विक पटल पर दर्शाता है।

कार्यक्रम का समापन चिन्मय त्रिपाठी (गायन) और जोएल मुखर्जी (गिटार) के कविता सन्ध्या आयोजन से हुआ जिसमें उन्होंने छायावादी कवयित्री महादेवी वर्मा की कविता ‘जाग तुझको दूर जाना’ को प्रस्तुत किया।

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