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‘आरटीआई कैसे आई’ : राजकाज को पारदर्शी व जवाबदेह बनाने के संघर्ष की कथा

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प्रति वर्ष 60-80 लाख आर टी आई आवेदन होते है जो की एक बड़ी संख्या है.

सुप्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय की पहली पुस्तक ‘आरटीआई कैसे आई’ के पहले सजिल्द संस्करण और दूसरे पेपरबैक संस्करण का दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में लोकार्पण हुआ. पुस्तक पर चर्चा के दौरान सूचना के अधिकार और उसके लिए हुए आन्दोलन के साथ, अधिकार को और प्रभावी कैसे बनाया जा सके-इस पर भी विस्तार से चर्चा हुई. इस अवसर पर चर्चा में मजदूर किसान शक्ति संगठन से अरुणा रॉय और शंकर सिंह के अलावा जानेमाने अर्थशास्त्री ज्‍यां द्रेज, सुप्रसिद्ध पत्रकार, सम्पादक ओम थानवी, जानेमाने पत्रकार और इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष रामबहादुर राय ने अपनी बातें रखीं. कार्यक्रम का संचालन सुपरिचित पत्रकार पाणिनि आनंद ने किया.

यह पुस्तक अंग्रेजी में प्रकाशित किताब 'The RTI Story' का हिंदी संस्करण है, जिसका हिंदी अनुवाद अभिषेक श्रीवास्तव ने किया है और राजकमल प्रकाशन के ‘सार्थक’ उपक्रम द्वारा  प्रकाशित  किया गया है .

अरुणा रॉय ने कहा, “आर टी आई क़ानून को लाने में हजारों लोगों जिसमे अर्थशात्री, पत्रकारों, जजों और विभिन्न विचारधाराओं की मेहनत है. आज देश में प्रति वर्ष 60-80 लाख आर टी आई आवेदन होते है जो की एक बड़ी संख्या है”.

किताब के बारे में बताते हुए अरुणा रॉय ने कहा “आरटीआई - कैसे आई' किताब लोकतंत्र की एक ऐसी लोककथा है, जो सूचना के अधिकार के सामूहिक संघर्ष की कहानी को बयां करती है. यह 1 जन आंदोलन का लोक आख्यान है ,जो बताता है किस तरह आरटीआई के लिए जनता ने मिलकर लड़ाई लड़ी और जीती और यह भी कि आरटीआई सिर्फ भद्रजन का विचार नहीं था, बल्कि आम जनता का जमीनी संघर्ष था. इस किताब की विशेषता यह भी है कि जिस तरह आरटआई जनता का सामूहिक आंदोलन है, उसी तरह सूचना के जन अधिकार के इस कथानक को भी आम जन ने ही सामूहिक रूप से रचा है. यह लोक द्वारा रची गयी लोकतंत्र की एक लोकप्रिय लोकगाथा है. दरअसल यह किताब मजदूर किसान शक्ति संगठन का सामूहिक बयान है. हम कह सकते हैं कि यह जन द्वारा किये गये 'जनसंघर्ष' का जन द्वारा लिखा गया 'जन इतिहास' है, जो 'जन- जन' तक इस किताब के ज़रिए पंहुचेगा”.
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ज्यां द्रेज ने कहा कि सूचना के अधिकार क़ानून को कमजोर करने की कोशिश लगातार हो रही है. एक नागरिक को राज्य के प्रति ज़्यादा पारदर्शी बनाने की कवायद हो रही है, जबकि सरकार को जनता के प्रति ज़्यादा पारदर्शी होना चाहिए था. इस प्रवृत्ति का विरोध करने और जनता के प्रति सरकार की ज्यादा जवाबदेही हो, उस संघर्ष को तेज करने के लिए यह पुस्तक बहुत ही मौक़े पर लाई गई है.

ओम थानवी ने अपनी बात रखते हुए कहा, “यह आन्दोलन पहले ही कानून के रूप में देश के लोगों के बीच में हैं, हां, मगर यह पुस्तक लोगों को इस कानून के पीछे के संघर्ष की कहानी बतायेगी. आरटीआई  वास्तव में जनमानस को वरदान के रूप में मिला है.”

रामबहादुर राय ने कहा, “आज के समय इस किताब का महत्व अधिक है क्योंकि इस तरह के आन्दोलन देश में हो नही रहे हैं. यह किताब भविष्य में जनमानस को अपने हक़ के लिए आन्दोलन करने, लड़ने की  प्रेरणा देगा.”

इस अवसर पर राजकमल प्रकाशन समूह के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी ने कहा कि समाज के लिए जरूरी किताबें छापना हमेशा से हमारी प्राथमिकता में है. आगे भी हमारा यही ध्येय रहेगा. सूचना का अधिकार आम नागरिक की ताकत है. इस ताकत को हासिल करने की कहानी जानना सबके लिए इसलिए भी जरूरी है, ताकि वे इसका मोल समझ सकें. इसे निष्क्रिय या भोथरा न बनने दें. इसका सही तरह से हर जरूरी मौके पर इस्तेमाल करें.

प्रश्नोतर में अरुणा रॉय और नागरिक सतर्कता संगठन की अंजलि भारद्वाज ने लोगों को आर टी आई आवेदन के बाद आने वाली परेशानिओं के समाधान के भी सुझाव दिए .
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लेखिका : अरुणा रॉय
अनुवाद : अभिषेक श्रीवास्तव       
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
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