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अरुणा मुकिम के पहले उपन्यास ‘दक्षायणी’ का लोकार्पण

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इस उपन्यास में शिव और शक्ति के प्रेम के वास्तविक स्वरूप की अद्भुत व्याख्या की गयी है.

प्रखर वक्ता और विचारक अरुणा मुकिम के उपन्यास ‘दक्षायणी’ का फिक्की सभागार में लोकार्पण किया गया. इस दौरान फ़िल्म, कला एवम् राजनीति के क्षेत्र से जुड़े दिग्गज मौजूद रहे. ‘दक्षायणी’ अरुणा मुकिम का पहला उपन्यास है. इसमें उन्होंने शिव और शक्ति के प्रेम के वास्तविक स्वरूप की अद्भुत व्याख्या की है. लेखिका ने स्वयं को सती के रूप में परिकल्पना कर, नारी जीवन के संघर्षों एवं विषमताओं का अत्यन्त प्रभावशाली चित्रण किया है.

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बॉलीवुड निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट ने कहा कि किताब में भगवान शिव और सती के वास्तविक प्रेम को दर्शाया गया है. उन्होंने लेखिका अरुणा की प्रशंसा करते हुए हर किसी को इस उपन्यास को पढ़ने की बात कही. उन्होंने कहा कि उनकी शिया मुस्लिम माँ ने बचपन में उन्हें शिव की कथा सुनाई थी. उनके मुताबिक यदि हम मिलजुल कर सम्मान भाव से रहेंगे तभी यह कहानियाँ जिंदा रहेंगी.

वरिष्ठ पत्रकार डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने भी इस अवसर पर अपने विचार रखे और अरुणा को शुभकामनाएं दीं. कार्यक्रम में गीतकार जावेद अख्तर, हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा, स्वामी अग्निवेश, सैफुद्दीन सोज़, नफ़ीसा अली, पंखुडी मुकिम भी मौजूद रहे.

वाणी प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अरुण माहेश्वरी तथा निदेशक अदिति माहेश्वरी ने पुस्तक के बारे में अपने अमूल्य विचार व्यक्त किए.

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‘दक्षायणी’ के बारे में :यह एक सशक्त उपन्यास है। इसमें शिव और शक्ति के प्रेम के वास्तविक स्वरूप की अद्भुत व्याख्या मिलती है। लेखिका ने इसमें अपने को सती के रूप में परिकल्पना कर, नारी जीवन के संघर्षों एवं विषमताओं का अत्यन्त प्रभावशाली चित्रण किया है। अपने पद एवं अहंकार के दर्प में आवेष्ठित, प्रजापति दक्ष, अपनी पुत्री सती के विचारों की निरन्तर अवहेलना करता है। उसे दक्षायणी का शिव के प्रति प्रेम एवं आसक्ति अनुचित लगती है। यद्यपि हर क्षण सती अपने पिता के प्रति निष्ठावान रहना चाहती है, फिर भी समय-समय पर शिव उसके जीवन में प्रवेश करते रहते हैं। कोमल भावनाओं के वशीभूत हो, दक्षायणी, सारे प्रयासों के बावजूद, अपने जीवन को शिवमय होने से रोकने में असफल रहती है। शिव और सती का विवाह एक ब्रह्माण्डीय योजना और अनिवार्यता है। दक्ष इसको रोकने में अक्षम रहता है। द्वेष एवं आक्रोश की अग्नि से ग्रस्त हो, वह अपने दामाद-शिव-के प्रति अपमानजनक शब्दों का प्रयोग उनकी अनुपस्थिति में, अपनी यज्ञशाला में सबके समक्ष करता है। इस पर कुपित हो, सती अपनी योग शक्ति से उत्पन्न अग्नि से अपने पार्थिव शरीर को भस्म कर लेती है। ‘दक्षायणी’ में इस दृश्य का चित्रण, बहुत मौलिकता एवं संवेदनशीलता से किया गया है। यह पाठक को उद्वेलित करने में सक्षम है।