Header Ads

शिक्षा की अलख जगाकर बच्चों और महिलाओं को साक्षर बनाने की मुहिम

लता सागर जैसे कम लोग हैं जो ज्ञान को खुद तक सीमित न रखकर दूसरों में बांट रहे हैं.

शिक्षा के बिना जीवन अधूरा है। उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के हसनपुर की लता सागर ने मानो ठान लिया है कि वे हर किसी को साक्षर करके ही दम लेंगी। प्रतिदिन शाम को पांच बजते ही उनके घर में बच्चों और महिलाओं की चहलकदमी शुरु हो जाती है। वे अपने उस कार्य में व्यस्त हो जाती हैं जो उन्हें सुकून देता है।

लता कहती हैं,'बिना ज्ञान सब सून।’ उनकी ये पंक्तियां भूली नहीं जा सकतीं। उनका जज़्बा अनेकों महिलाओं को विश्वास प्रदान करता है। उनमें हौंसला पैदा करता है कि पढ़ाई-लिखाई बेहद जरुरी है। वे निशुल्क शिक्षा दे रही हैं। उनके लिए यह समाजसेवा नहीं बल्कि धर्म है।

शिक्षा की अलख जगाकर बच्चों और महिलाओं को साक्षर बनाने की मुहिम
लता सागर महिलाओं और बच्चों को अपने घर में पढ़ाती हैं.

लता सागर की शाम आस-पड़ोस के बच्चों एवं महिलाओं के साथ गुजरती है। उनके बीच वे स्वयं को धन्य महसूस करती हैं। उन्हें लगता है जैसे उन्होंने कोई नया मुकाम हासिल कर लिया हो। ये उनके लिए गर्व की बात है कि वे प्रतिदिन ऐसे लोगों से मिलती हैं जिन्हें वे ज्ञान की ज्योति बांट रही हैं।

वे बताती हैं कि आसपास की अधिकतर महिलाओं को अपना नाम लिखना नहीं आता था। उन्होंने यह जाना तो आश्चर्य हुआ। तभी से लता सागर ने बीड़ा उठाया और अशिक्षित महिलाओं और बच्चों को शिक्षा देने लगीं। वे कहती हैं,'हम जितना पढ़ लिये उसका दस प्रतिशत भी दूसरे सीख पाये तो जिंदगी सफल है। ये महिलायें नाम लिखना सीख रही हैं। धीरे-धीरे अखबार पढ़ना तथा गणित के सवाल भी सीख जायेंगी।’

छोटे बच्चे गरीब परिवारों से हैं जिन्हें पढ़ाकर लता को आत्मसंतुष्टि होती है। लता कहती हैं,'जब ये कुछ नया सीख कर मुझे सुनाते हैं तो सुकून मिलता है। मैं चाहती हूं कि ये बच्चे अच्छे क्षेत्र में जायें, नौकरी करें तथा अपने परिवार की निर्धनता दूर करें। महिलायें भी शिक्षा की कीमत समझें। परिवार वाले अपने बच्चों को कभी पढ़ाई से न रोकें। अखबार पढ़ें और देश-दुनिया से रुबरु हों। हिसाब-किताब रखें तथा हर जगह अंगूठा न लगाकर हस्ताक्षर करें। सिर्फ इतना ही चाहती हूं, लगातार जुड़ी रहती हूं इन लोगों के साथ।’ इतना कहकर वे मुस्करा उठती हैं।

लता सागर जैसे कम लोग हैं
लता सागर कहती हैं,'हम जितना पढ़ लिये उसका दस प्रतिशत भी दूसरे सीख पाये तो जिंदगी सफल है'.

लता सागर बताती हैं,'अपनी जाति में वह आसपास के गांवों में पहली लड़की थीं जिसने दसवीं पास की थी। यह 1989 की बात है। ईनाम के रुप में मुझे 300 रुपये और एक सूट दिया गया था। मैं बहुत खुश हुई। एक लड़की के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी। स्वतः ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह खुशी कितनी रही होगी।’

लता सागर जैसे कम लोग ही हैं। वे अपने ज्ञान को खुद तक सीमित न रखकर दूसरों में बांट रहे हैं जो अपने में बहुत मायने रखता है। वे ऐसे संसार की रचना करने की कोशिश कर रहे हैं जिससे बदलाव आयें। उनकी सोच और विश्वास ऐसे हैं जिनसे दुनिया में जागरुकता आयेगी।

साक्षरता विचारों में बदलाव लाती है तथा हमारी समझ को नये सिरे से विकसित करती है।

-हरमिंदर सिंह.


समय पत्रिका  के ताज़ा अपडेट के लिए हमारा फेसबुक  पेज लाइक करें या ट्विटर  पर फोलो करें. आप हमें गूगल प्लस  पर ज्वाइन कर सकते हैं ...