काका के काव्य का कायल कुनबा

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पदमश्री काका हाथरसी के अवतरण और अवसान पर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम एक दूसरे को हास्य और खुशियां बांटने का कार्य करते रहें.

हास्य कवि काका हाथरसी को देह त्यागे 21 वर्ष हो गये। वे 18 सितम्बर 1906 को हाथरस में गर्ग परिवार में जन्मे थे। यह संयोग ही था कि वे 89 वर्ष की आयु पूरी कर 18 सितम्बर 1995 में संसार को हमेशा के लिए अलविदा कह गये। उनके द्वारा हास्य व्यंग्य की दर्जनों पुस्तकें उनकी याद दिलाती रहेंगी। इन पुस्तकों में काका ने हमारे सामाजिक ताने-बाने, तीज-त्योहारों तथा कई अन्य पक्षों पर ऐसी शैली में काव्य सृजन किया कि जिसे पढ़ते ही पाठकों में हंसी के फव्वारे फूट पड़ते हैं। उन्होंने अपने हास्य से ओतप्रोत काव्य को भारत से लेकर दुनिया के अनेक देशों के विभिन्न मंचों तक पहुंचाया।

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उनका परिवार मामूली दुकानदार था जिसके कारण उनकी माली हालत बहुत अच्छी नहीं थी। काका हाथरसी का असली नाम प्रभुनाथ गर्ग था। शिक्षणकाल में उन्होंने एक नाटक में काका नामक पात्र का रोल किया था। लोग उन्हें उसी नाम से पुकारने लगे तो उन्होंने काका के साथ अपने गृहनगर हाथरस का नाम जोड़कर अपना नाम काका हाथरसी रख लिया। सभी रचनाओं में उन्होंने स्वयं को काका और अपनी पत्नि को काकी के नाम से उच्चारित किया है।

प्रमुख काव्य ग्रंथ - काका को भारत सरकार ने पदमश्री से सम्मानित किया। उन्होंने काका की कचहरी, काकदूत, काका की फुलझड़ियां, काका के कहकहे, आदि दर्जनों हास्य काव्य से सराबोर पुस्तकें लिखी हैं। प्रस्तावना से लेकर अंत तक पाठक हास्य रस में डूबता-उतराता है। हंसते-हंसते शुरु कर हंसते-हंसते पुस्तक समाप्त करता है।

मेरे दादाजी पुस्तकों के बहुत प्रेमी थी। उनकी निजि लाइब्रेरी में न जाने कितने विषयों की छोटी-बड़ी पुस्तकें थीं। इनमें धार्मिक तथा इतिहास से संबंधित हिन्दी, अंग्रेजी, पंजाबी, उर्दू, बंग्ला, संस्कृत भाषाओं की पुस्तकों के साथ चीनी और रशियन साहित्य भी काफी था। मेरे बड़े चाचा और भाई-बहन काका हाथरसी की रचनाओं को बेहद पसंद करते थे। मेरे बड़े चाचा रामचरन सिंह 95 साल के हो गये लेकिन आज भी उनके पास कोई भी परिचित आता है तो वे प्रसंगवश काका हाथरसी की एक-दो रचना जरुर सुनाते हैं। वृद्धावस्था में उनके स्मृतिपटल पर मौजूद काका की रचनाओं से उनकी स्मरण शक्ति के साथ काका के काव्य से उनके लगाव का स्पष्ट प्रमाण भी मिलता है।

पितृपक्ष का समय है तथा श्राद्ध भी शुरु होने वाले हैं। इसी मौके पर काका की एक हास्य रचना यहां प्रस्तुत है :
'पितृपक्ष की प्रतिपदा, लगी श्राद्ध की रस्य।
खाद्यासन पर जम गये पांडे पत्थर भस्म।।
पांडे पत्थर भस्म, फंसे यजमान अभागे।
सोलह पूड़ी बीस कचौड़ी रख दीं आगे।।
कह काका कवि चकित हो गये लाला लाली।
पांच मिनट में सफाचट्ट कर डाली थाली।।'

पदमश्री काका हाथरसी के अवतरण और अवसान पर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम एक दूसरे को हास्य और खुशियां बांटने का कार्य करते रहें।

-जी.एस. चाहल.

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काका के काव्य का कायल कुनबा काका के काव्य का कायल कुनबा Reviewed by Harminder Singh on September 18, 2016 Rating: 5
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