मनीष आता रहेगा, मैं बच नहीं सकता

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वह सुनाता रहा, मैं घिसता रहा. मेरे माथे पर पसीना था. मन रो रहा था. वह कुर्सी पर बैठा सफर के किस्से लुत्फ लेकर सुनाता जा रहा था. जानबूझकर उसके ठहाके के बाद मुझे हंसना पड़ रहा था.

उसकी बालों से दुश्मनी नहीं थी, लेकिन वह अपने बालों को कहीं से कीचड़ में सान लाया था. वह शायद समझ नहीं पा रहा था कि उसे हुआ क्या है. मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि उसे बिल्कुल भी मालूम नहीं था कि उसे काले बालों पर भद्दा भूरा और सफेद-काले रंग का कीचड़ का मिश्रण सिर के बीच में लगा हुआ है.

ऐसा अकसर तब होता है जब सिर के बीच में कुछ गिरा हो या कोई सिरफिरा यह कारनामा जानबूझकर कर गया हो. उसकी पत्नि है नहीं, पड़ोसी से आजतक वह झगड़ा नहीं है. कमरे की छत से वह कुर्सी पर खड़ा होकर भी तीन फीट नीचे रह जाता है. वह खुद यह बता नहीं सकता क्योंकि उसे पता नहीं चल रहा था.

सिर के कीचड़ से अनजान उस व्यक्ति का नाम मनीष है. पिछले दिनों जब वह किराये के कमरों की खोज करता हुआ हमारे मोहल्ले में पहुंचा तो रास्ते में मेरी उससे मुलाकात हुई थी. तब भी उसके बालों पर इतना रुखापन था कि कोई भी कह सकता था कि वह बालों का दुश्मन है. ऐसा लगता था जैसे पैदा होने के एक साल बाद उसने तेल लगाना छोड़ दिया था या बालों ने तेल पकड़ना मुनासिब नहीं समझा.

आंखों को मेरे जूतों पर गढ़ाते हुए उसने किराये के कमरों की जानकारी ली. तब मैं भी जमीन से नजरें मिलाते हुए उसे पड़ोस में रहने वाले शर्मा जी के यहां लेकर गया. दोपहर के तीन बजे का समय था और शर्मा जी आराम से बरामदे में चारपाई पर बैठकर रजिस्टर में हिसाब लगा रहे थे.

उनकी उंगलियों को देखकर और कलम की पकड़ को देखकर मैं हैरान था. झुर्रिदार चमड़ी और उम्र 80 के पार होने के बाद भी शर्मा जी के हाथों में कंपन नहीं थी. लिखावट ऐसी जैसे स्कूल की सुलेख प्रतियोगिता में भाग लिया हो और सुलेख बस निपटा दिया हो.

मनीष को शर्मा जी के पास छोड़कर मैं रास्ते में था. एक कुत्ता भौंकता हुआ आया और मेरे बगल से सरपट भागा. मैंने उसे तबतक देखा जबतक वह एक मोड़ से गायब नहीं हो गया. इसी बीच दीवार से मैं टकरा सकता था क्योंकि मेरे कदम तेज थे, निगाह कुत्ते पर, चाल बिगड़ने से कोण खराब हुआ था. दीवार महज कुछ इंच की दूरी पर थी. यदि कुत्ता मोड़ से गायब न होता तो मेरे माथे पर गूमड़ निकलना स्वाभाविक था.

मनीष आज जब अपने सफर के बारे में मुझे विस्तार से बता रहा था, मैं उसके सिर को देख रहा था. मैं चाहता तो सामने फर्श पर निढाल पड़ी झाड़ू को उठाकर उसे बालों को कीचड़ मुक्त कर सकता था. मैंने इंतजार किया. तीन मिनट, फिर पांच मिनट. रहा नहीं गया, झाड़ू को लपका. पीछे से मनीष के सिर पर झाड़ू को तेजी से फिरा दिया. वह माजरा जान पाता, कीचड़ जो तबतक सूख चुका था, वहां नहीं था.

‘झाड़ू, क्या यार.’ वह इतना ही बोला.

‘रहा नहीं गया, यार.’ मैंने भी इतना ही कहा.

केवल एक मिनट से कम समय में मैंने मनीष को सारी बात बता दी. उसका ठहाका गूंजा, सामने से गुजर रही पिंकी आंटी ने मुंह पिचकाकर हमें देखा और आगे बढ़ गयी.

सफर की दास्तान सुनते-सुनते झपकी लग गयी. मनीष ने मुझे जगाया. फिर झपकी. फिर जगाया. बार-बार ऐसा होने पर उसने एक पानी की बोतल अपने हाथ में ढक्कन खोलकर रख ली. बोतल देखकर मैंने निश्चय किया कि झपकी नहीं होगी.

झपकी तय थी, और पानी का छपाका भी.

‘क्या, यार.’ मैं चिल्लाया नहीं, यह मामूली झुंझलाहट थी.

‘सुनो, यार.’ वह इतना ही बोला.

उसकी कहानी बेमन से मैंने सुन ली, लेकिन उसके बाद मैं ऐसा बेदम हुआ कि सुबह चार बजे से पहले तक मुझे यह पता नहीं चला कि मैं कहां हूं.

सुबह दस बजे फिर वह आ धमका.

बोला,‘कहानी पूरी करने आया हूं.’

‘क्या, यार.’ मैंने उसे बहुत समझाया और कपड़े धोने की बात तक कह दी. साबुन की घिसी टिकिया और पुराने कपड़े लेकर बैठ भी गया.

वह सुनाता रहा, मैं घिसता रहा.

मेरे माथे पर पसीना था. मन रो रहा था.

वह कुर्सी पर बैठा सफर के किस्से लुत्फ लेकर सुनाता जा रहा था. जानबूझकर उसके ठहाके के बाद मुझे हंसना पड़ रहा था.

आखिर सुबह सात बजे से शुरु दूसरा भाग दस बजे खत्म हुआ. कपड़े धुले हुए दोबारा धुल गये थे. मैं लगभग आधा घंटा नहाता रहा.

मनीष से बचा नहीं जा सकता यह मैं जानता हूं. वह आता रहेगा.

-हरमिंदर सिंह.


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मनीष आता रहेगा, मैं बच नहीं सकता  मनीष आता रहेगा, मैं बच नहीं सकता Reviewed by Harminder Singh on July 31, 2016 Rating: 5
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